ओढ़ के मैंने रंग ये भगवा
शिरोमणी को याद किया
डाल के चूनर रंग सफ़ेदी
उलगुलान आग़ाज़ किया
पहन के मैंने हरे रंग को
नेताजी संग नाज़ किया
चक्र अशोकन तिलक लगाकर
माँ तुझे प्रणाम किया
याद में मैंने बिरसा मुंडा
सिद्धो कान्हू का सम्मान किया
अल्बर्ट एक्का की शहादत
नम आँखों से बयाँ किया
जंगल की ख़ुश्बू ये सौंधी
खनिज पदार्थों संग हरियाली
संस्कृति अप्रतिम ये प्यारी
हिन्दुस्तान के नाम किया
नदियाँ बहती कल-कल दिन भर
झरने गिरते वो पहाड़ पर
जीभ में स्वाद धुत्तू रोटी का ले कर
धरती आबा के लिए संग्राम किया
खंड एक ये वो भारत का
लोगों में पहचान किया
ऋतुओं के इस पावन पर्व को
झारखण्ड का नाम दिया
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